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Bhay Aakraant: COVID-19 Ke Prabhav Mein Raftar Se Kata Ek Samay (Hindi Edition)


Price: ₹ 110.00
(as of Jun 14,2021 15:35:29 UTC – Details)


‘भय आक्रांत’ तालाबंदी के दिनों में भारत के सबसे बड़े भयग्रस्त केंद्र मुंबई से लिखी गयी कोरोना डायरी है। इस किताब में वर्ष 2020 के ठहरे हुये समय को दर्ज किया गया है। ‘भय आक्रांत’ शीर्षक से लिखी गयी इस किताब में उस समय को शब्द दिया गया है जिसे महामारी के प्रभाव में देखा गया था। इस किताब में उन दृश्यों और विडंबनाओं की आत्मा को पकड़ने का प्रयास हुआ है जिसमें आम जनता का दर्द दर्ज हुआ था।

वर्ष 2019 के अंत में चीन के वुहान शहर से निकले नोवल कोविड-19 वायरस ने चीन से बाहर पहले थाइलैंड फिर ईरान और इटली सहित कुछ देशों में दस्तक दी। वर्ष 2020 के शुरुआती महीनों में विश्व के कुछ हिस्सों तक पहुँच कर इस नवेले वायरस ने एक साथ कई देशों को बीमार कर दिया। जब तक दुनिया इस वायरस को समझ पाती तब तक वायरस से उपजी बीमारी ने महामारी का रूप ले लिया। आधा मार्च बीतते-बीतते कोविड-19 वायरस कोरोना वायरस के नाम से महामारी बनकर विश्वभर में फैल गया। सामुहिक स्वास्थ्य की एक अघोषित इमरजेंसी ने विश्व के कई देशों को एक साथ भय आक्रांत कर दिया। विश्व के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि दुनियादारी की सारी बातों को किनारे कर देखते ही देखते आधी दुनिया ने अपने को तालाबंद (lockdown) कर लिया।

तालाबंदी के दिनों में क्वारंटाइन के नाम पर हम अपने घरों में कैद हो चुके थे। संक्रमण के भय से हम अपने समाज से कट कर अलग – थलग रहने पर मजबूर हो गये। साँस को जकड़ लेने वाली इस बीमारी से अपनी साँस को बचाये रखने के प्रयास में हम कई महीनों तक भय से आक्रांत रहे। हम डरते रहे कि कहीं उन स्थितियों में न पहुँच जाएँ कि हमें साँस लेने के लिए कृत्रिम मशीन की जरूरत पड़ने लगे। हम यह सोच-सोच कर घुटते रहे कि कहीं ऐसा न हो कि हम बीमार पड़ें और हमें या हमारे परिजन को अस्पताल में जगह ही न मिले। हमारे घर के ऊपर वाले फ्लैट में या हमारे ठीक बगल वाले मकान में कोविड के सक्रिय मामले वाला मरीज रह रहा था। हम उसकी छींक और खाँसी से डर कर अपने दो – चार कमरों वाले मकान में महीनों तक सिमटे हुए जीवन को बचाये रखने का संघर्ष करते रहे।

70 दिनों के उस लंबे कैद में एक खिड़की ही थी जो हमें बाहर की दुनिया से जोड़े रखती थी। खिड़की और दरवाजे दीवारों में पहले भी थे लेकिन कोरोना काल में दीवार में उनके होने का महत्व अचानक बढ़ गया था। बाहर से रह-रह कर एम्बुलेंस की आवाजें आतीं और एक-एक कर बीमार को उठाकर ले जातीं। एक समय बाद बाहर की ये हलचलें थम जातीं लेकिन एक समय बाद वही हलचलें घर में कैद व्यक्ति के भीतर सुनाई देने लगतीं। फिर लगातार सुनाई दे रही हलचलें बाहर की होतीं अथवा मनुष्य के भीतर की ; कह पाना मुश्किल हो जाता। यह उन दिनों की विवशता थी जिसके हम सब भुक्तभोगी रहे। ऐसे निर्जन समय में सबके होते हुए भी आदमी बिल्कुल अकेला हो गया था। डरावनी शांति, संदेह और अकेलेपन के उन दिनों में चिड़िया की एक मासूम सी चहचहाहट भी बचे रहने का आश्वासन देती थी। यह हमारे आस-पास की वो आवाज थी जिसे इससे पहले हमने कभी महत्व नहीं दिया। जिसके होने का महत्त्व उन दिनों अचानक बढ़ गया जिन दिनों दुनिया मौन थी।

हमने पूरा वर्ष महामारी और बेरोजगारी के खौफ़ में बिताया। हम डरते रहे कि करोड़ों नौकरियों की तरह कहीं हमारी नौकरी भी तालाबंदी की बलि न चढ़ जाये। बीमारी और संक्रमण के भय ने कइयों को बेरोजगार कर दिया। कई लोग गहरे अवसाद में ढ़केल दिये गये। कुछ ही महीनों में धीरे – धीरे बढ़ते – बढ़ते यह महामारी एक महावृतान्त में बदल गयी। इस महामारी ने ऐसी असंख्य अनपेक्षित कहानियों को जन्म दिया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।विश्व ने भले ही महामारी के विभिन्न रूप देखें होंगे किंतु संक्रमण के बिल्कुल शुरुआती दौर में त्रासदी के जो दृश्य भारत में देखे गये वो शायद ही किसी और देश में देखें गये होंगे!

इस किताब में COVID-19 के प्रभाव में रफ्तार से कटे उस समय को छोटे – छोटे रोचक गद्य में बाँट कर लिखा गया है। पाठक अपनी रुचि के अंश को पढ़ सकें इसलिए उन अंशों को उचित शीर्षक दे कर लिखा गया है। इसके विविध अंकों में भारत में महामारी की त्रासदी के वर्णन के साथ जीवन की क्षति का करुण चित्रण है। बेरोजगारी – पलायन व अवसाद की स्थितियों का मार्मिक वर्णन तो है ही साथ ही सभ्यता और संस्कृति में परिवर्तन पर चिंतन भी हुआ है। इस कथेतर गद्य के विविध अंकों में तालाबंदी, बीमारी, बेरोजगारी, पलायन, अकेलापन, अवसाद, भय, अपमान, इलाज, संक्रमण, शवकांड, वायरस संबंधी शोध-परीक्षण व सामूहिक स्वास्थ्य को सुरक्षित करने वाले टीकों के बनने और टीकाकरण होने तक की दशा और दिशा को पूरी संवेदना और सजगता के साथ उतारने का प्रयास हुआ है।

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